मंगलवार, 16 नवम्बर 2010

चाय की दुकान और मैखाने के बीच में मिला था मैं इनसे

पिल्ले थे, अब बड़े हो गए हैं,
दुबारा इन्हें इस तरह लढ़याते नहीं देखा ,
आज-कल बस रोटी की तलाश में रहते हैं,
चायवाला पहले इन्हें बिस्किट दिया करता था...

रविवार, 14 नवम्बर 2010

मौसम

आज भी बादलों में कुछ चेहरे दिखाई देते हैं,
आज भी पानी ठहरकर कुछ कहता है, चल देता है,
आज भी हवा चेहरे पर पड़कर, मुस्कान ला देती है,
आज भी लोग मुझे पागल समझते हैं,
पता नहीं, ऐसा कब तक चलेगा!

शनिवार, 13 नवम्बर 2010

झरना

नदी अपनी राह में बहते वक्त,
रास्ते में कई जगह पहाड़ों से गिरती है,
जिसे देखकर लोग वाह-वाह करते हैं,
इंसान इस तरह से क्यों नहीं गिरता?

शुक्रवार, 12 नवम्बर 2010

झील

ये झील भी छलक आयी थी,
 तेरी आँखों की तरह,
मुझे रात के ढाई बजे का,
वो रोता हुआ चाँद याद है. 

बृहस्पतिवार, 11 नवम्बर 2010

बारिश

मेरे दर्द भरे किस्सों की दास्ताँ कुछ यूँ हुई,
 के भरी धूप में  आसमां भी  रो पड़ा..